Home राष्ट्रीय अमेरिका-ईरान समझौता : कौन झुका, किसे मिला फायदा और भारत पर क्या होगा असर?

अमेरिका-ईरान समझौता : कौन झुका, किसे मिला फायदा और भारत पर क्या होगा असर?

by Skgnews

वॉशिंगटन/तेहरान। तीन महीने से अधिक समय तक चले सैन्य तनाव के बाद अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम तथा व्यापक शांति समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि दोनों देशों के बीच अंतरिम समझौते का मसौदा तैयार हो चुका है और जल्द ही इस पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। हालांकि समझौते की कई शर्तों और उनके क्रियान्वयन को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद अब भी बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रस्तावित समझौते में कई ऐसे बिंदु शामिल हैं जिन पर अमेरिका और ईरान दोनों को अपने-अपने रुख में नरमी दिखानी पड़ी है। सबसे अधिक चर्चा होर्मुज जलडमरूमध्य, तेल निर्यात, आर्थिक प्रतिबंधों और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हो रही है।

समझौते की प्रमुख शर्तें

प्रस्तावित मसौदे के अनुसार लेबनान सहित सभी क्षेत्रीय मोर्चों पर तत्काल युद्धविराम लागू किया जाएगा। अमेरिका 30 दिनों के भीतर ईरान के खिलाफ लगाई गई नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने पर सहमति बनेगी। समझौते में ईरान को अपने नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम जारी रखने की अनुमति देने का प्रावधान भी शामिल है। इसके बदले ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करने की प्रतिबद्धता दोहराएगा और संवर्धित यूरेनियम के भंडार पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार करेगा। इसके अलावा अमेरिका ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से निलंबित करेगा। विदेशों में जब्त ईरानी संपत्तियों को भी चरणबद्ध तरीके से जारी करने की योजना पर चर्चा चल रही है।

कौन झुका, किसे मिली बढ़त?

विश्लेषकों के अनुसार समझौते के मसौदे में कई ऐसे मुद्दे हैं जहां अमेरिका को अपने शुरुआती रुख से पीछे हटना पड़ा है। अमेरिका पहले ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रॉक्सी संगठनों को बातचीत का हिस्सा बनाना चाहता था, लेकिन मौजूदा मसौदे में इन विषयों को प्रमुख एजेंडे से बाहर रखा गया है। दूसरी ओर ईरान को भी कुछ अहम मामलों में समझौता करना पड़ा है। तेहरान को परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार करनी होगी और संवर्धित यूरेनियम के भंडार को सीमित करना होगा। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए खोलने पर भी सहमति जतानी पड़ी है।

होर्मुज जलडमरूमध्य पर क्या बनी सहमति?

दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। अनुमान है कि विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन इसी मार्ग से होता है। समझौते के तहत 30 दिनों के भीतर इस मार्ग को फिर से खोला जाएगा। हालांकि इसका प्रशासनिक नियंत्रण ईरान के पास रहेगा। टोल शुल्क की जगह ईरान जहाजों से सीमित सेवा शुल्क वसूल सकेगा। यही बिंदु दोनों पक्षों के बीच सबसे बड़ी सहमति के रूप में देखा जा रहा है।

भारत के लिए क्या मायने?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है और इसका अधिकांश तेल होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते ही आता है। ऐसे में इस मार्ग के खुलने से तेल आपूर्ति सामान्य होने और वैश्विक बाजार में स्थिरता लौटने की उम्मीद है। ईरान पर तेल प्रतिबंधों में ढील मिलने से भारतीय रिफाइनरियों को एक अतिरिक्त आपूर्ति स्रोत उपलब्ध हो सकता है। अतीत में ईरान भारत को अपेक्षाकृत अनुकूल शर्तों पर तेल उपलब्ध कराता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है और भारत को ऊर्जा आयात बिल में राहत मिल सकती है। हालांकि होर्मुज मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर सेवा शुल्क लागू रहने की स्थिति में शिपिंग लागत बढ़ सकती है, जिससे पूरी राहत मिलने की संभावना सीमित हो सकती है।

अब भी क्यों बना हुआ है तनाव?

समझौते के मसौदे के बावजूद कई मुद्दों पर मतभेद कायम हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार को नष्ट करे या देश से बाहर भेजे, जबकि ईरान इसे अपनी संप्रभुता से जुड़ा विषय मानता है। इसके अलावा विदेशों में जब्त 24 अरब डॉलर की ईरानी संपत्तियों को जारी करने के समय और प्रक्रिया पर भी दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। लेबनान में हिजबुल्ला और क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों की भूमिका भी विवाद का विषय बनी हुई है। इसी कारण समझौते के मसौदे पर सहमति बनने के बावजूद अंतिम हस्ताक्षर और उसके क्रियान्वयन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

आगे क्या?

यदि प्रस्तावित समझौता अंतिम रूप लेता है तो यह पश्चिम एशिया में पिछले कई वर्षों का सबसे बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम साबित हो सकता है। इससे न केवल क्षेत्रीय तनाव कम होगा बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को भी राहत मिलने की उम्मीद है। भारत सहित तेल आयातक देशों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि अमेरिका और ईरान कब और किन शर्तों के साथ इस समझौते को अंतिम रूप देते हैं।

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