- शैलेश कुमार सिंह
नई दिल्ली : लोकतंत्र में लोकनीति पर सार्वजनिक बहस स्वाभाविक ही नहीं, बल्कि जरूरी भी है। आजीविकाओं (खास तौर से ग्रामीण परिवारों के लिए) को आकार देने वाले कानूनों की कड़ाई से समीक्षा की ही जानी चाहिए। लेकिन इस तरह की समीक्षा नए कानून के प्रावधानों के सावधानी पूर्वक अध्ययन पर आधारित होनी चाहिए। यह पिछले फ्रेमवर्क से निकाले गए अनुमानों या नुकसान के भय पर आधारित नहीं होनी चाहिए। मगर विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून 2025 की ज्यादातर आलोचनाएं इस जाल में फंस जाती हैं। इनमें जल्दबाजी में पिछली नाकामियों का विश्लेषण कर उनका ठीकरा सुधार पर ही फोड़ दिया जाता है।
दो दशक पहले बनाए गए रोजगार गारंटी कानून ने ग्रामीण आय को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और संकट के वक्त सुरक्षा प्रदान की। कोविड की वैश्विक महामारी जैसे संकट के समय में इसके योगदान को स्वीकार किया गया है। लेकिन समय के साथ अनुभव से इसकी दीर्घकालिक ढांचागत कमियां भी उजागर हुई हैं। मजदूरी के भुगतान में बार-बार देरी हो रही थी। प्रक्रियात्मक अवरोधों ने बेरोजगारी भत्ते को अप्रभावी बना दिया था। विभिन्न राज्यों में इस योजना तक पहुंच में काफी अंतर था। प्रशासनिक क्षमता असमान थी तथा फर्जी जॉब कार्ड, उपस्थिति के रजिस्टर में हेरफेर और खराब गुणवत्ता वाली संपदाओं के सृजन से बड़े पैमाने पर धन की बर्बादी हुई। ये छोटी नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक खामियां थीं। इसलिए मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि क्या सुधार की जरूरत थी। मुद्दा यह है कि क्या नए फ्रेमवर्क में इन खामियों को सार्थक ढंग से दूर किया गया है।
आम दावा है कि नए कानून में बुनियादी कमियां तो बनीं रहीं और समूची बहस को संक्षिप्ताक्षरों की होड़ में समेट दिया गया। लेकिन हकीकत में इसका उलट ही सच के ज्यादा करीब है। नया कानून डिलीवरी की उन कमियों को दूर करने पर केंद्रित है जिनकी वजह से पिछले फ्रेमवर्क की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा था। कमजोर परंपरागत प्रणालियों की जगह सत्यापित कामगार पंजीकरण ने ले ली है। देरी के लिए स्वतः मुआवजे के प्रावधान के साथ मजदूरी भुगतान की वैधानिक समय सीमाएं तय की गई हैं। अयोग्यता के उन प्रक्रियात्मक प्रावधानों को खत्म कर दिया गया है जिनकी वजह से बेरोजगारी भत्ता अप्रभावी बन गया था। स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही के साथ शिकायत निवारण को मजबूत किया गया है। ये दिखावटी बदलाव नहीं हैं। ये उन खामियों को दूर करते हैं जिनसे कामगारों का विश्वास टूटता था।
एक अन्य आलोचना यह है कि रोजगार गारंटी को खत्म कर दिया गया है। इनके अनुसार नई योजना में पुरानी कमजोरियां बनी हुई हैं। इस तरह की आलोचना सही नहीं है। वेतन रोजगार के कानूनी अधिकार को बरकरार और न्यायसंगत रखा गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि रोजगार की वैधानिक पात्रता को 100 दिनों से बढ़ाते हुए 125 दिन कर दिया गया है। बदलाव क्रियान्वयन की संरचना में किया गया है। पुराने कानून का मॉडल टुकड़ों में बंटा हुआ और प्रतिक्रियात्मक था। यह अक्सर संकट शुरू हो जाने के बाद ही हरकत में आता था। नए कानून का फ्रेमवर्क योजनाबद्ध और लागू करने योग्य है। इसे पूर्वानुमान के आधार पर कार्य सौंपे जाने के लिए डिजाइन किया गया है। वैधानिक सुधार के जरिए क्रियान्वयन की नाकामियों को दूर किए जाने को दोहराव नहीं, बल्कि संशोधन माना जाना चाहिए।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे अधिक गरीब आबादी वाले राज्यों को पहले के फ्रेमवर्क के तहत सबसे कम लाभ मिलने के सम्बन्ध में जो चिंताएं जताई गईं हैं, वे सही हैं लेकिन यह बात सुधार की जरूरत को और मजबूत करती है, न कि उसे कमजोर करती है। इन राज्यों में मनरेगा का लाभ कम पहुंचा यह योजना की एक बड़ी विफलता थी। बिना किसी ठोस योजना के सिर्फ मांग के आधार पर चलने वाला मॉडल उन राज्यों के पक्ष में रहा जिनकी प्रशासनिक क्षमता बेहतर थी, जबकि अधिक जरूरत और पलायन वाले राज्य पिछड़ गए। नया फ्रेमवर्क सीधे तौर पर इस असंतुलन को दूर करता है, यह रोजगार पैदा करने के काम को ‘विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं’ से जोड़ता है, जहाँ स्थानीय मांग और कामों की पहले से मंजूरी को सुनिश्चित फंडिंग के साथ मिलाया जाता है। असमान वितरण ही सुधार की ज़रूरत की असली वजह थी; पुरानी व्यवस्था को बनाए रखने का मतलब केवल मौजूदा असमानताओं को और बढ़ाना होता। इसके अलावा, निष्पक्ष मानकों पर आधारित आवंटन से राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता आएगी।
आलोचना का एक पक्ष यह भी है कि 125 दिनों का रोजगार देने का विस्तार केवल दिखावा है, क्योंकि अब राज्यों को भी खर्च का एक हिस्सा उठाना होगा। यह तर्क पहले के उदाहरणों और सुरक्षा उपायों दोनों को नज़रअंदाज़ करता है। केंद्र और राज्यों के बीच खर्च बांटने का यह तरीका केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के पुराने नियमों के अनुसार ही रखा गया है। वहीं, उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों तथा जम्मू-कश्मीर के लिए 90:10 के अनुपात (जहाँ केंद्र 90 और राज्य 10 प्रतिशत खर्च उठाते हैं) को जारी रखा गया है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि योजना बनाकर काम करने से पैसों का बेहतर इस्तेमाल होता है, जिससे अनिश्चितता खत्म होती है और योजना को लागू करने में कम रुकावटें आती हैं। अधिकारों का दायरा बढ़ाना और साझा जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल को दर्शाता है, न कि कमज़ोरी को। ग्रामीण सड़कों से लेकर, आवास और पीने के पानी जैसे कई सफल राष्ट्रीय कार्यक्रम भी इसी तरह की व्यवस्था के तहत काम करते हैं।
आर्थिक रूप से कमज़ोर राज्यों को अक्सर नए फ्रेमवर्क का संभावित शिकार बताया जाता है। लेकिन सिर्फ़ आर्थिक कमज़ोरी ही राज्यों के बाहर होने का कारण नहीं है। पिछली व्यवस्था के तहत, राज्यों का इस योजना से बाहर होना अक्सर खराब प्लानिंग, सरकारी मशीनरी की कम क्षमता और काम करने के तरीके में आने वाली रुकावटों की वजह से था। नया कानून पहले से की गई तैयारी, जनता की भागीदारी और प्रौद्योगिकी के जरिये जोखिमों को कम करने की कोशिश करता है। नयी व्यवस्था में एक बार योजना मंजूर होने के बाद, काम देने से मना करने की अधिकारियों की शक्ति को कम किया गया है और पारदर्शिता तथा जवाबदेही को मजबूत किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासनिक खर्च को 6% से बढ़ाकर 9% कर दिया गया है जिससे राज्य अपनी जमीनी क्षमता को कार्यक्रम की विशालता के अनुरूप मजबूत बना सकें। किसी राज्य विशेष की अपनी चुनौतियाँ उस राष्ट्रीय सुधार को गलत साबित नहीं करतीं, इसका उद्देश्य पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को ठीक करना है।
आलोचक यह भी कहते हैं कि पहले के फ्रेमवर्क के तहत कई ज़रूरतमंद राज्यों में रोज़गार के सबसे कम दिन मिले, और बहुत कम परिवार ही कानूनी सीमा तक पहुँच पाए। यह बात सुधार के तर्क को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे और भी मजबूत बनाती है। नया फ्रेमवर्क, दर्ज की गई मांग को मंजूर किए गए कामों, तय समय सीमा में पूरा करने और बेरोजगारी भत्ते को सुनिश्चित करेगा। इसका मकसद सीधा है: कानूनी हक को असल और भरोसेमंद रोज़गार के दिनों में बदलना, खासकर उन इलाकों में जहाँ पहले सुविधाओं की कमी थी।
पुरानी ‘मांग-आधारित’ योजना और नई ‘आपूर्ति-आधारित’ योजना के बीच के अंतर को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। व्यवहार में, यह अंतर इतना बड़ा नहीं है। नया फ्रेमवर्क डिमांड को कम नहीं करता; बल्कि यह योजना के माध्यम से इसे एक संस्थागत रूप देता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मांगी गई मांग को पूरा भी किया जा सके। संसाधनों के भरोसे के साथ की गई एक नियोजित मांग, उस सैद्धांतिक अधिकार से कहीं ज्यादा सशक्त है जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता।
रोजगार गारंटी का अधिकार-आधारित स्वरूप, कमजोर होने के बजाय और मजबूत हुआ है। काम के दिनों को बढ़ाकर 125 दिन करना, मजदूरी भुगतान के लिए कानूनी रूप से लागू समय-सीमा, देरी होने पर अपने-आप मिलने वाला मुआवजा, हक छीनने वाली शर्तों को हटाना, और शिकायत निवारण के लिए अपील की सुविधा—ये सब मिलकर ‘काम के अधिकार’ की व्यावहारिक उपयोगिता को बढ़ाते हैं। अधिकार सबसे ज़्यादा तब मायने रखते हैं जब उनका प्रशासनिक बाधाओं के बिना इस्तेमाल किया जा सके।
यहां तक कि आलोचक भी मानते हैं कि योजना को लागू करने की विफलताएं—जैसे भ्रष्टाचार, फर्जी जॉब कार्ड, उपस्थिति रजिस्टर में हेरफेर और खराब गुणवत्ता वाली संपदाओं का निर्माण, पुराने फ्रेमवर्क की सबसे बड़ी कमजोरियां थीं। यह सुधार इन्हीं विफलताओं को दूर करने की कोशिश करता है, जिसके लिए सत्यापित लाभार्थी प्रणाली, मजबूत ऑडिट और अन्य योजनाओं के साथ मिलकर संपदा निर्माण का सहारा लिया गया है। पिछली विफलताओं को स्वीकार करना ही इस सुधार का ठोस आधार है, न कि इसके खिलाफ कोई तर्क।
योजना को कुछ समय के लिए रोकने को लेकर जो चिंताएं हैं, उन्हें सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह श्रम-बाजार के लिए एक सुरक्षा कवच है जिसे इसलिए बनाया गया है ताकि खेती के सबसे व्यस्त सीजन के दौरान श्रमिकों की कमी न हो और बाजार का संतुलन न बिगड़े। यह प्रावधान 125 दिनों के कानूनी अधिकार को कम नहीं करता है। यह प्रावधान सोची-समझी आर्थिक समझदारी को दिखाता है और उत्पादक कृषि रोज़गार को कमज़ोर किए बिना मजदूरों की आय की रक्षा करता है।
कुल मिलाकर, ज़्यादातर की जा रही आलोचनाएं पुराने फ्रेमवर्क की कमियों को बताती हैं और फिर उन कमियों का कारण खुद सुधारों को बताती हैं। विकसित भारत–रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम रोज़गार गारंटी को खत्म नहीं करता है बल्कि यह इसे और मजबूत और व्यापक बनाता है। खासकर उन कमज़ोरियों पर ध्यान देता है जहाँ ज़्यादा ज़रूरत वाले इलाकों और कमज़ोर मज़दूरों के बीच योजना के प्रभाव को सीमित कर दिया था। यहाँ सुधार का अर्थ सामाजिक सुरक्षा से पीछे हटना नहीं है; बल्कि यह काम के वादे को वास्तविक, भरोसेमंद और गरिमापूर्ण बनाने का एक प्रयास है।
- लेखक : शैलेश कुमार सिंह, भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग में सचिव हैं

