Monday, March 31st 2025

गढ़वाल की विलुप्त होती परम्परा डड्वार

गढ़वाल की विलुप्त होती परम्परा डड्वार
कोटद्वार (गौरव गोदियाल) । वर्तमान समय में गढ़वाल क्षेत्र में पलायन सबसे ज्यादा हुआ है और होता जा रहा है। सरकार के द्वारा पलायन रोकने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं किन्तु इसके बावजूद भी पलायन रूकने का नाम नहीं ले रहा है । पलायन के साथ – साथ हमारी संस्कृति एवं परंपराएं भी विलुप्त की कगार पर हैं आज हम आपको गढ़वाली की एक विलुप्त होती परंपरा डड्वार के बारे में बताने जा रहे हैं ।
डड्वार, पर्वतीय समाज में प्रचलित प्रथा के अनुसार दर्जी, लुहार या अन्य कारीगरों को उनके द्वारा किये जाने वाले नियमित और पारंपरिक कार्यों के बदले हर फसल पर दिए जाने वाले अनाज की निश्चित मात्रा को कहा जाता है । डड्वार पहले तीन लोगों ब्राह्मण, लोहार और औजी को दिया जाता था। अब धीरे-धीरे यह परंपरा खत्म होती जा रही है। इसके बदले अब लोग पैसे देने लगे हैं। दरअसल प्रदेश में सालभर में दो मुख्य फसलें होती हैं। जिसमें एक गेहूं-जौ और दूसरी धान की। इसमें हर फसल पर डड्वार दिया जाता था।
डड्वार में फसल पकने के बाद पहला हिस्सा देवता को दिया जाता था। जिसे पूज कहा जाता है। इसके बाद दूसरा हिस्सा पंडित का दिया जाता था। ये एक तरह की पंडित को दक्षिणा होती थी। तीसरा हिस्सा लोहार का था, जो फसल काटने से पहले हथियार तेज करता था। इसके अलावा दिवाली पर घर पर आकर ढोल बजाने या शादी विवाह या फिर किसी खुशी के मौके पर ढोल बजे वाले ओजी समाज को भी डड्वार दिया जाता था ।