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कुंवर विक्रमादित्य सिंह द्वारा रचित कविता "वृक्ष" मैं खड़ा हूँ पत्तियों संग शाखा यु फैलाये जाता ..........................

15-06-2019 10:04:05 By: एडमिन

कुंवर विक्रमादित्य सिंह द्वारा रचित कविता  "वृक्ष"           

                    वृक्ष

मैं खड़ा हूँ पत्तियों संग शाखा यु फैलाये जाता
देखता हूँ उसी पल से जब से तू इतराये जाता

है न तुझको ज्ञात पर सम्बन्ध मेरा है पुराना
कितने ही बरसो से हमने सीखा संग बढ़ते जाना
पौध था जब कुल में तेरे मेरे चक्कर था लगाता
खेलता तू किलकारी कर संग मेरे झूमे जाता

दोनों ने सालों में देखा धीरे धीरे बढ़ता जाना
झांकता हूँ उन पलो से आज तक का यह फ़साना

कितने ही मौसम जो बीते हम कभी भी क्या अलग थे
मेरे भीतर छाँव पाकर कितने तेरे पल थे बीते
मेरी शाखाओं पे चढ़कर ज़ोर तूने थे लगाए
कभी लटके कभी धरकर मुझको तू देता झुमाये

बात हमने शब्दों में न करी होगी यह पता है
पर हमारे रिश्तों की अनुपम लिखी यह कथा है

आज मैं इतना बड़ा हूँ वैसे ही निहारता हूँ
तुझको देखूं यूँ खड़ा उन यादों को बधारता हूँ
हाथ में तेरे कुल्हाड़ी भाव चेहरे पर नहीं हैं
वार करके पूर्ण करले इच्छा अगर तेरी यहीं है

मैं अगर बाधा बना हूँ आज तेरे सामने तो
मेरी हर शाखा निभाएगी हमारी मित्रता को

मैं खड़ा हूँ पत्तियों संग शाखा यूँ फैलाये जाता
तू चाहता जो भी हो मेरा सदा आशीष पाता

                                                      - विक्रमादित्य