देहरादून (मनोज श्रीवास्तव): परखने की शक्ति, निर्णय करने की शक्ति और धारण करने की शक्ति । जिस व्यक्ति को, जिस समय, जिस विधिपूर्वक सहयोग या शिक्षा चाहिए, अगर परखने की शक्ति तीव्र है, इसमें सफलता अवश्य प्राप्त होगी। जैसे शारीरिक बीमारी को परखने की विधि डाक्टर को न आये तो रोग ठीक होने के बजाय अनेक रोग पैदा हो जाते हैं। रोगी को संतुष्टि भी नहीं मिलती है। अर्थात परखने की शक्ति तीव्र करने की जरूरत है, लेकिन इसमें अंतर पड़ जाता है। इसको हम साधारण भाषा में हैंडलिंग का फर्क कहते हैं। किसी समय व्यक्ति की ग्रहण शक्ति कितनी है, वायू मंडल कैसा है, उस व्यक्ति के सुनने और शिक्षा लेने का मूड कैसा है, यह प्रमुख तथ्य हैं।
हंस की निर्णय करने की शक्ति और परखने की शक्ति विशेष होती है। इसलिए धारण करने की शक्ति भी विशेष होती है, जिसकी सहायता से मोती और कंकण दोनों को परखता है, फिर निर्णय करता है, इसके बाद मोती ग्रहण करता है और कंकण पत्थर ग्रहण करता है। इसे कहते हैं, परखना, निर्णय करना और ग्रहण करना अर्थात् धारण करना। जैसे किसी कमजोर शरीर वाले को ज्यादा ताकत के इंजेक्शन दे दें, तो पेंशेंट के बजाय, पेशेंस हो जाता है, हार्टफेल हो जाएगा और वह शांति में चला जाएगा। इसी तरह यदि कोई व्यक्ति कमजोर है, उसमें हिम्मत नहीं है, लेकिन उसे शिक्षा का डोज बढ़ाते जाएं और उसका मूड, समय और वायूमंडल न परखे तो वह व्यक्ति हिम्मत हार जाता है, और शक्ति न होने के कारण ज्ञान को ग्रहण नहीं कर सकता हैं। इसके कारण वह व्यक्ति जिद और सिद्ध करने में उछलने लगता है। जैसे कोई व्यक्ति मुक्ति का इच्छुक है और उसको हम जीवन मुक्ति भी दे दें तब भी वह रूचि नहीं रखेगा। पानी के प्यासे को 36 प्रकार का भोजन दे दें तो, तब भी वह संतुष्ट पानी की बूंद से ही होगा न कि भोजन से।
यदि परखने की शक्ति यथार्थ है, श्रेष्ठ है तो निर्णय भी यथार्थ होगा और हम जिसको जो देना चाहते हैं, उसमें ग्रहण करने की शक्ति स्वतः ही हो जाएगी। इसलिए सारे दिन यह चैक करें कि दिनचर्या में परखने की शक्ति कहां तक यथार्थ हुई है और कहां तक करेक्शन और एडिशन करने की जरूरत है। दिव्य बुद्धि का वरदान सभी को मिला हुआ है, चाहे समस्या के वश या समय से, परिस्थिति के वश या किसी व्यक्ति के संग के वश, तो हम परवश हो जाते हैं। लेकिन समय, परिस्थिति संग का प्रभाव जब हल्का हो जाता है, तब दिव्य बुद्धि काम करने लगती है, जिसको लोग कहते हैं, जोश से होश में आना। फिर महसूस होता है, कि यहां करेक्शन और एडिशन होनी चाहिए थी।
परखने की शक्ति को बढ़ाने से अपने कर्मों को भी परख सकेंगे और दूसरे कर्मों को भी यथार्थ परख सकेंगे। उल्टे को सुल्टा नहीं कहेंगे। व्यर्थ और साधारण कर्म करने पर अपने आप को नहीं पहचान सकते हैं। यह राईट है अथवा रांग है। उस समय हमारी बुद्धि परिस्थिति के वशीभूत हो जाती है। राईट को भी रांग समझते हैं, और रांग को रांग नहीं समझते हैं। इसके बाद जिद करते हैं और सिद्ध करते हैं। यह वशीभूत बुद्धि की निशानी है।

अव्यक्त बाप-दादा 10 जनवरी, 1990

लेखक : मनोज श्रीवास्तव, उपनिदेशक सूचना एवं लोकसम्पर्क विभाग उत्तराखण्ड

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