कोटद्वार (डॉ. तनु मित्तल): कहते हैं कि महिलाएं समाज का एक बहुत महत्वपूर्ण व ज़रूरी हिस्सा हैं जिनके बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पर क्या वास्तव में महिला को समाज का हिस्सा माना जाता है? महिलाओं ने शुरू से ही अपने अस्तित्व व अधिकारों को पाने के लिए बहुत सी लडाईयाँ लड़ी हैं, बहुत सी यातनाएँ झेली हैं। बहुत लम्बे समय के बाद महिलाओं को कानून का साथ मिला ओर पुरूषों के समान अधिकार मिले, देश में बनने वाला हर कानून नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए बनाया जाता है, ताकि हर पीड़ित को इंसाफ और उसका हक मिल सके। महिलाओं के साथ होने वाले तमाम तरह के अपराधों, शारीरिक-मानसिक शोषण, प्रताड़ना और हिंसा से उन्हें बचाने के लिए उन्हें कई कानूनी कवच दिए गए हैं। पर मुझे कई बार लगता है की आज महिलाओं के अधिकार तो बहुत हैं पर मिलते कितने हैं या महिलाएं अपने अधिकार समाज से ले कितने पा रही है, इसका पता नही है।
मैं अपनी एमए की कक्षा में महिलाओं का समाजशास्त्र पढ़ा रही थी  तब मेरा सभी से प्रश्न था की समाज में लड़का या लड़की किसको वरीयता दी जाती है तो मुझे उत्तर मिला लड़के को एक ने तो यहा तक  कहा की लड़कियाँ पैदा नहीं होनी चाहिए। मैंने उन से बातचीत की तो पता चला की उसकी बहन के साथ बहुत गलत हुआ है ओर उनकी किसी ने कोई सहायता नहीं की, न कानून ने न ही समाज ने। उन्होंने अपनी बहन के जीवन की कुछ धटनाएं साझा की और उनकी बात सुनकर मुझे ये महसूस हुआ की समाज में आज भी महिलाओं के अधिकार, समानता, बराबरी आदि नहीं हैं। केवल कानूनी किताबों में समानता होने से समानता नहीं मिलती  या यूं कहे की महिलाएँ अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल नहीं कर पाती। अदालत जाना तो दूर की बात है।
मेरे द्वारा समाजशास्त्र के छात्र छात्राओं को शोध कार्य कराया गया जिसमें एक विषय था सामाजिक विधानों के प्रति महिलाओं में जागरूकता। महिलाओं में विधानो के प्रति जागरूकता तो है पर उनके अंदर का डर उनको बांधे हुए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि महिलाएँ खुद को इतना स्वतंत्र नहीं समझती कि इतना बड़ा कदम उठा सकें। जो किसी मजबूरी में अदालत जा भी पहुँचती हैं, उनके लिए कानून की पेचीदा गलियों में भटकना आसान नहीं होता। इसमें उन्हें किसी का सहारा या समर्थन भी नहीं मिलता है। इसके कारण उन्हें घर से लेकर बाहर तक विरोध के ऐसे बवंडर का सामना करना पड़ता हैं की उनके लिए जीवन की डगर और कठिन हो जाती है। इस नकारात्मक वातावरण का सामना करने के बजाय वे अन्याय सहते रहना बेहतर समझती हैं। कानून होते हुए भी वे उसकी मदद नहीं ले पाती हैं। संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के अलावा भी समय-समय पर महिलाओं की अस्मिता और मान-सम्मान की रक्षा के लिए कानून बनाए गए हैं, मगर क्या महिलाएँ अपने प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ न्यायालय के द्वार पर दस्तक दे पाती हैं?
साक्षरता और जागरूकता के अभाव में महिलाएँ अपने खिलाफ होने वाले अन्याय के विरुद्ध आवाज़ ही नहीं उठा पातीं। शायद यही सच भी है। भारत में साक्षर महिलाओं का प्रतिशत 74 के आसपास है और गाँवों में तो यह प्रतिशत और भी कम है। जो साक्षर हैं, वे जागरूक भी हों, यह भी कोई जरूरी नहीं है। पुराने संस्कारों में जकड़ी महिलाएँ अन्याय और अत्याचार को ही अपनी नियति मान लेती हैं और इसीलिए कानूनी मामलों में कम ही रुचि लेती हैं। हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल, लंबी और खर्चीली है कि आम आदमी इससे बचना चाहता है। अगर कोई महिला हिम्मत करके कानूनी कार्रवाई के लिए आगे आती भी है, तो थोड़े ही दिनों में कानूनी प्रक्रिया की जटिलता के चलते उसका सारा उत्साह खत्म हो जाता है।
अगर तह में जाकर देखें तो इस समस्या के कारण हमारे सामाजिक ढाँचे में नजर आते हैं। महिलाएँ लोक-लाज के डर से अपने दैहिक शोषण के मामले कम ही दर्ज करवाती हैं। संपत्ति से जुड़े हुए मामलों में महिलाएँ भावनात्मक होकर सोचती हैं। वे अपने परिवार वालों के खिलाफ जाने से बचना चाहती हैं, इसीलिए अपने अधिकारों के लिए दावा नहीं करतीं। उन्हें इस अत्याचार, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठानी होगी। साथ ही समाज को भी महिलाओं के प्रति अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाना होगा। वे भी एक इंसान हैं और एक इंसान के साथ जैसा व्यवहार होना चाहिए वैसा ही उनके साथ भी किया जाए तो फिर शायद वे न्याय पूर्ण और सम्मान जनक जीवन जी सकेंगी।
लेखिका : डॉ. तनु मित्तल, विभाग प्रभारी समाजशास्त्र, डॉ. पी. द. ब. हि. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटद्वार

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