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’हिमालय के अस्तित्व’ के लिए गंभीरता का अभाव

18-09-2020 21:46:58 By: एडमिन

पैठाणी / गढ़वाल (देवकृष्ण थपलियाल): हिमालय दिवस के बहानें नीतिकारों और पर्यावरण सरोकारों के जुडे तमाम मनीषियों नें हिमालय के अस्तित्व को बचानें को लेकर फिर चिन्ता जाहिर की है, लेकिन चिंतन-मनन और बातचीत के क्रम में हिमालय की सेहत से जुडे जैसे गंभीर मुद्दे को फिर, बिना किसी सार्थक पहल/बहस/नीति-नतीजे के खत्म कर देना ? हिमालय के असन्न संकटो से  बेपरवाह होना अथवा इसकी जानकारी से इनकार करना जैसा है ? उम्मीद थीं कि जून 2013 केदारनाथ त्रासदी व हर साल प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त राज्य के नीतिकारों को कुछ ठोस ’पहल’ करना सुझेगा ? परन्तु सारे विमर्श से कोई भी गंभीर ’विचार’ नदारद था ? परेशान करनें वाला विषय ये भी है कि ’ऑल वेदर रोड’ के निर्माण से उपजे संकट से भी कोई भी सबक लेंनें का प्रयास नही हुआ ? इस निर्माण के कारण जगह-जगह टुटते-दरकते बोल्डर, पहाडों से यहॉ की जमीन की हकीकत सामनें आ रही है, निकट भविष्य में इस पर सोचा नहीं गया तो इन हिले हुऐ पहाडों से कितनी दुर्घटनाऐं सामनें आयेगी कहा नहीं जा सकता ? भला हो भारत के माननीय उच्चतम न्यायालय का जिन्होंनें इस संवेदनशील हिमालय में ’ऑल वेदर रोड’ की चौडाई को 12 मीटर से सीधे 5.5 मीटर कर दी ?

हिमालय दिवस पर भी वही हुआ जो  आमतौर पर हर दिवस-विशेष पर होता हैं। ऐसे दिवस-विशेष पर आयोजित होंनें वाले ऐसे कर्मकॉण्डों का उद्देश्य एक दूसरे को उपकृत करना तथा राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति करनाभर है। लेकिन हिमालय दिवस पर भी महज मिथ्या भाषण बाजी ? जिसका मतलब है, की योजनाकारों के लिए हिमालय की सुरक्षा और उसकी सेहत से जुडा हर-एक पहलू कितना गैरजरूरी है ? मसलन हिमालय दिवस पर आयोजित कार्यक्रम बेबीनार में शिक्षा मंत्री अरविंद पॉण्डे हिमालय की सुरक्षा के लिए ’खुशी के मौके पर एक वृक्ष रोपनें की सलाह देते हैं ? राज्य के मुखिया भला पीछे क्यों रहते, उन्होंनें नें भी शैक्षिणिक संस्थानों को पेड रोपनें की ऐवज में 10,000 रूपयें की धनराशि देंनें की घोषणा की हालॉकिं इस घोषणा के अमल में आनें का अभी इंतजार है ? गर्मियों के दिनों में उत्तराखण्ड की बहुमूल्य वन संपदा धूॅ-धूॅ के जल जाती/जला दी जाती है, जिसमें हर साल करोडों रूपयों के साथ-साथ बहुमुल्य वन संपदा हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है, जनधन की हानिं होती है, सो अलग । हिमालय के ग्लेशियरों को पिघलानें में यह दावानल ’आग में घी डालनें का काम’ करती है। इस समस्या से निजात पानें के लिए मुख्यमंन्त्री जी नें 8,000 नौजवानों को तैनाती का वचन दिया है, इस घोषणा के पीछे का उद्देश्य हिमालय की चिन्ता कम अपनीं कुर्सी बचानें की बू ज्यादा आ रही है ? अपने 3 सालों की अकर्मण्यता को छुपानें के लिए इससे बढिया मौका दूसरा हो नहीं सकता था ? अगर उनसे ये पूछा जाय कि उनका ’वन महकमा’ क्या रहा था/है, तो फिलहाल हिमालय के अस्तित्व पर हो रही चर्चा भटक सकती है ?

हिमालय पर देश की 65 फीसदी जनता की निर्भरता है, अर्थात हिमालय की सेहत में थोडी  सी गडबडी भी करोडों लोगों को सांसत में डाल सकती है। हिमालय से जुडे तमाम वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता भी बार-बार चेता रहें हैं की मानवीयकृत्यों से हिमालय की सेहत आहत है, अगर ये सब नहीं रूका तो मानव जीवन पर इसका प्रभाव अच्छा नहीं होगा ? बजाय नीति-निर्माता इसकी परवाह किये बिना ऐसी नीतियों का निर्माण लगातार जारी है।

विश्व धरोहर के रूप में प्रसिद्व नंदा देवी वायोस्फीयर रिजर्व के ऋषि गंगा कैचमेंट एरिया में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा गठित अनुसंधान दल नें पता लगाया की साल 1980 से साल 2017 के बीच हिमालय के ग्लेशियरों की पिघलनें की दर 10 फीसदी गिरावट आई है। 80 के दशक में नंदा देवी वायोस्फीयर रिजर्व के ऋषि गंगा कैचमेंट का कुल 243 वर्ग किमी0 क्षेत्र बर्फ से ढका हुआ था, परन्तु 2017 में यह घट कर 217 वर्ग किमी0 रह गया है। अर्थात इन 37 सालों में हिमाच्छादित क्षेत्रफल सीधे तौर पर 26 वर्ग किमी कम हुआ है। अनुसंधान दल नें यह भी देखा की इस क्षेत्र का स्नोलाइन 5200 मीटर पर थी जो अब 5700 मीटर तक घट-बढ गईं हैं। यही नही ंदल नें बर्फवारी की स्थिति का ऑकलन किया है, जो पहले कम हुआ है। वहीं बेंगलुरू स्थित इंस्टीस्टीट्यूट ऑफ सांइस के वैज्ञानिक अनिल वी कुलकर्णी के अनुसार हिमालय पर आसन्न संकट से हम बेखबर हैं, ग्लेशियर जिस तेजी से पिघल रहे हैं वह हमारे लिए चिंता का विषय है। हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलनें से नदियों का पानीं धीरे-धीरे कम हो रहा है, स्थिति सुखनें की भी आ सकती है। हिमालय के चंद्राबेसिन के ग्लेशियरों के पिघलनें का क्रम जारी है। 100 वर्षों के अंतराल में बारिश का क्रम जिस तरह से परिवर्तित हो रहा है, राज्य के ऊॅचाई वाले इलाकों में ट्री लाइन भी पीछे खिसक रही है, जिससे स्वाभाविक रूप से ग्लेशियर सिकुडेंगें ? इस कारण राज्य में बडी प्राकृतिक आपदाऐं और कई प्रजातियों के वृक्षों की मृत्यु भी सम्भव  है ? जो न केवल मनुष्य की सेहत के लिए नुकसानदायक है, अपितू आर्थिक रूप से भी उसको उसका खामियाजा भूगतना पडेगा, इस कारण पेड-पौधों में कई बदलाव देखे गये हैं, उनकी पुनरूत्पादकता और गुणवत्ता में भी अंतर देखा जा रहा है।

मध्य हिमालय की गोद में स्थित होंनें के कारण राज्य का भविष्य बहुत कुछ हिमालय की सेहत जुडा हुआ है, तथापि हिमालय के फायदे से लेकर नुकसान का सबसे ज्यादा हकदार भी हमीं  है, इसके लिए हिमालय की सुरक्षा का दायित्वबोध हमारे नीति-निर्माताओं में होंना चाहिए ? जैसे-जैसे तापमान बढेगा हिमालय ग्लेशियर पिघलेंगें, जिससे जीवनदायिनी नदियॉ सूख जायेंगी, प्राकृतिक आपदायें बढेंगीं। 

लेकिन पिछले दो दशकों के दौरान वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं के लाख चेतानें पर भी कोई ध्यान दिया नतीजन जून 2013 से लेकर हर साल आनें वालीं प्राकृतिक आपदाओं से   सरकारों नें कुछ नहीं सीखा ? केवल विकास के नाम पर हिमालय को घायल करनें का काम किया जा रहा है, सदानीरा नदियों से अगर कोई सम्बन्ध है, तो वह है बीजली पैदा करनें के लिए, चार धाम यात्रा को सूगम बनानें के लिए ’ऑल वेदर रोड’ का कमाल देखिये ! 21 सदस्यीय विशेषज्ञों की रिर्पोट को भी नजरअंदाज करनें कोशिश हो रही है, ? परन्तु सुप्रीम कोर्ट की  न्यायमूर्ति रोहिंगटन फली नरीमन की पीठ नें भारत सरकार के अधिवक्ता सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के लाख तर्क प्रस्तुत करनें पर भी माननीय न्यायालय नें सडक की चौडाई को महज 5.5 मीटर तक सीमित कर दिया जबकी ऑल वेदर रोड की चौडाई 12 मीटर तक रखे जानें का प्रावधान है  भले बाद में इसे 7 मीटर रखनें का प्रावधान था ।

पर्यटन, तीर्थाटन, बीजली के लिए बडे-बडे बॉधों के निमार्ण को बढावा देंनें के पीछे की मंशा राज्य की आर्थिकी को मजबूत करना व नौजवानों को रोजगार मुहैय्या कराना हो सकता है, लेकिन इसके पीछे हिमालय की पारिस्थितिकी को ध्यान में रखे बिना योजना बनेंगी तो उसका खामियाजा बडे नुकसान के रूप में चुकाना पडेगा ? 2018 में राज्य में 3 करोड 67 लाख पर्यटकों का आवागमन हुआ था, 2019 में कांवड मेले में श्रृद्वालु गण पधारे इसी साल 2019 में चार धाम यात्रा में 35 लाख यात्रियों नें दर्शन किये हैं। अब अंदाजा लगाना मुश्किल कि वे अपनें साथ कितना कुडा-कचरा ले के आये होंगें ? जिसका नुकसान यहॉ पारिस्थितिकी को होना निश्चित है। वेैसे राज्य तेजी से बढ रहे नगरीकरण के कारण कुडे-कचरे के निष्पादन की समस्या बढी है ? राज्य में तेजी से बढ रहे प्राइवेट वैकल्स का चलन तथा यात्रियों से मोटर वाहन से तापमान में वृद्वि तथा ग्लेशियरों के पिघलने की गति किसी भी तरह हिमालय की सेहत  शुभ नहीं है, वैज्ञानिकों के 20 सालों के अध्ययन मे तापमान में 3 डिग्री सेल्सीयस की बढोत्तरी की पुष्टि हुई है।

राज्य और देश की समृद्वि के लिए जरूरी है हिमालय का सुरक्षित होना, लेकिन पिछले दशकों से  हिमालय की सेहत को जिस तरीके अनदेखा किया जा रहा है, उससे आनें दिनों  की मुश्किलें बढ सकतीं हैं, नीति-निर्माताओं को अभी से मिल रहे संकेतो से सीख लेंनी चाहिए और ठोस हिमालय नीति पर काम करना चाहिए ।