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"कोरोना" नें पहाडवासियों से क्या कहा ?

25-04-2020 22:58:47 By: एडमिन

पैठाणी / गढ़वाल (देव कृष्ण थपलियाल): कोरोना वायरस नें जहॉ दुनियॉ-जहान को संकट में डाल दिया है, वहीं, इसके दुष्प्रभावों नें   हजारों-लाखों लोगों को काल-कल्लवित कर रहा/दिया है, सभी प्रमुख राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था निरंतर पतनोन्मुखी होंनें के कारण दुनियॉ के लाखों-करोडों लोग बेरोजगारी के मुहानें पर खडे हैं। इस वायरस की सबसे बडी मार उन लोंगों पर पडी है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में मेहनत-मजदूरी करके किसी तरह अपना और अपनें घर-परिवार का पेट  पालते थे, उन्हें अब लाचारी और भूखमरी से दो-चार होंना पड रहा है।  बडी तादात  में कंपनियों, कल-कारखानों व औद्योगिक घरानें नें अपनें कामकाज को सिमटा दिया है, जिस कारण बडी संख्या में लोंगों को बेरोजगार हो गये है ? व्यावसायिक-व्यापारिक गतिविधियॉ पूर्णतया ठप है, जिसनें आम लोग को भी तंगहाली में जीनें को मजबूर कर दिया है।

 

जो जहॉ है, उसे वहीं ठहरनें की सलाह-हिदायत दी जा रही है, जिससे लोग अपनें परिवारजनों, मित्र-रिश्तेदारों व शुभचिंतकों से मिलनें से भी वंचित हैं ? हालॉकि इस वाइरस से बचनें और लाइलाज कोरोना वायरस की चैंन को तोडनें के लिए इससे बडा  कारगर और अचूक हथियार और कोई नहीं है ? फिलहाल देश-दुनियॉ में चिकित्सकों/वैज्ञानिकों नें इसके उन्मूलन के लिए कोई कारगर दवा ईजाद नहीं की है, लिहाजा ’बचाव’ ही इसका सर्वोत्तम उपाय है, इसके लिए डॉक्टरों, वैज्ञानिकों व मेडीकल साइंस के अध्येताओं नें सामाजिक दूरी, बार-बार हाथ साफ करनें और मास्क पहननें को तवज्जो दी, जिससे वायरस किसी दूसरे व्यक्ति/जीवनधारी के शरीर में प्रवेश ही न कर सके ? जिसके सुखद परिणाम भी मिले है। स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार का ऑकलन है, की इसकी तैयारी पहले से न हुई, होती तो सम्भव है, की संक्रमित व मौतों के ऑकडों में गुणात्मक रूप से इजाफा होता, मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार यह ऑकडा 8.20 लाख तक सम्भव था, जिसे संभालना बेहद मुश्किल होता ? केद्र व राज्य सरकारों के प्रयास   काबिले तारीफ है। देश के प्रधानमंत्री कई बार टेलीविजन पर देश के नागरिको से सीधे तौर से आग्रह कर चुके हैं कि वे "लॉकडाउन" के नियमों किसी भी दृष्टि से अनदेखी न करें, उनका पालन करें और करवायें, "जान है तो जहान है" की नीति का अनुसरण करते हुऐ, हर देशवासी को इसके खतरे से सचेत किया है। कुछ विद्वतजनों द्वारा इसे "तीसरे   विश्वयुद्व" की संज्ञा प्रदान करना न्यायोचित प्रतीत होता ?

 

कोविड-19 से उपजे संकट के दूष्परिणामों से जहॉ आम आदमी आहत व भयभीत है वहीं इस विपत्ति की घडी कुछ आसन राहे भी मुफीद हुईं हैं। इस कारण भागमभाग की जिंदगियों में थोडा ठहराव, और सुकून के पल नसीब हऐ, लम्बे समय के बाद नदियॉ इतनीं साफ दिखाई दीं, सरकार के अरबों रूपये खर्च करनें बाद भी कभी गंगा कभी इतनीं साफ नहीं दिखी, दिल्ली में प्रदुषण तेजी से घट रहा है, मुबंई के समुद्र तट पर लाखों की संख्या में कछुए देखे जा रहे हैं। कई अन्य जलचर, थलचर, और  वायु के सहारे जीनें वाले बहुतेरे पशु-पक्षी खुली हवा का आंनद ले रहें हैं। महानगरों की फिजाओं में एक अजीब सी रंगत है, कारण हर समय धुंध और यातायात के कारण  मोटर-गाडियों  के कोलाहल से दूर शान्त और स्वच्छ पर्यावरण किसी अजनबी लोक से कम नहीं हैं।

 

वहीं "कोरोना इफैक्ट" के चलते पहाड के लगभग 60,000 से अधिक नौजवानों नें घर वापसी की है, गॉवों में रोनक बढी है, ये लोग रोजी-रोटी की तलाश में घर से दूर महानगरों व विदेशों तक जा पहुंचे हैं, दुनिया भर के व्यावसायिक प्रतिष्ठान, कल-कारखानें व उद्योग-धंधें कोरोना वायरस के चलते ठप्प होंने से उनके रोजगार उनसे छिन गये जिस कारण घर लौटनें के सिवाय उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा ? हालॉकि कुछ लोग उनके यूँ घर चले आनें को उन्हें कोविड-19 के ध्वजवाहक, पलायनवादी, बीमारी फैलानें वाले कह कर भला-बूरा कहनें से भी बाज नहीं आये, उन्हें गालियॉ दीं गईं, सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो अपलोड हुऐ जिस पर उन्हें अपमानित किया गया ? गॉव-गॉव में ऐसी कईं पंचायतें भी सामनें आयीं, जिनमें उनके खिलाफ समाजिक बहिष्कार तक का ऐलान हुआ, लेकिन शुक्र है, ईश्वर का, की पहाड में अभी कोई इस वायरस की चपेट में नहीं आया ?  

 

परन्तु असली सवाल ये है की कोई भी अपनें घर को छोडनें को क्यों विवश हो जाता है ? सच तो ये है की उस मजबूरी को हमारें समाज और हुक्मरानों नें कभी समस्या ही नहीं मानी ? दो दशकों के इस राज्य के निर्माण की मूल अवधारणा के पीछे इस क्षेत्र की बेतहाशा पलायन की प्रवृत्ति को रोकना था। राज्य के पास प्रचूर मात्रा में प्राकृतिक व दैवीय संसाधनों की उपलब्ध होंनें के बावजूद उसका रचनात्मक उपयोग न तो यहॉ की आर्थिकी बढानें में हुआ, ना यहॉ के नौजवानों को रोजगार देंनें में । पृथक राज्य बना परन्तु समस्या ज्यों के त्यों रही । राज्य बननें के दो दशकों के इतिहास में पलायन रोकनें तथा नौजवानों को नौकरी देंनें में सरकारें फिसड्डी साबित हुईं ? पहाड के जनप्रतिनिधि नेतागण जिस कोदा-झंगोरा खा कर राज्य के विकास हुंकार भरते रहे, अब उन्होंनें जनता को इसके लायक भी छोडा ? आज हालात पहले से बदत्तर हैं, जिस कोदा-झंगोरा खाकर पहाड के लोगों नें अपनीं जींदगी बसर की, उन खेत-खलिहानों को जंगली जानवरों (बंदर-सुअंरो) नें एकदम चौपट कर दिया।

 

राज्य की जमीन पर ऐसा को संसाधन विकसित नहीं है, जिससे आम लोग अपनी रोजी-रोटी का जुगाड कर सकें ? राज्य की धरती को देवभूमि के नाम से जाना जाता है, पहाड का प्राकृतिक शौंदर्य पर्यटन के लिए सबसे ज्यादा मुफीद है, जलराशि के रूप में "गंगा" "यमुना" का उद्गम के साथ-साथ अनेक  प्रमुख नदियों की जन्मदात्री होते हुए भी लोगों को पीनें के लिए साफ पानी मुहैय्या नहीं है।  प्रकृति प्रदत्त इन वरदानों के सही नियोजन का अभाव न किसी को रोजी देंनें के काम आया न तीर्थाटन-पर्यटन करनें वालें लाखों लागों को सही सुविधा और सम्मान  मिला हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत इसे कोरोना से घर आये लोंगों को "अवसर" के रूप में देखते हैं, अपनें प्रयासों के तहत वे "रिवर्स पलायन" का सपना देखते रहे है,  विगत  2018 में उन्होंने "रिवर्स पलायन" को अमलीजामा पहनानें के लिए "पलायन आयोग" का गठन किया था। जिसनें ऑकडे तो जुटाये पर राज्य में रिवर्स पलायन के लिए न कोई "रोड मैप" बना न कोई विचार सामनें आया ? पलायन आयोग क्या कर रहा है, इस बात को सीएम से ज्यादा कोंन जानता ? इससे अच्छा काम डीएम पौडी धीरज सिंह गर्ब्याल अपनें प्रशासनिक कामों के इतर कर रहे हैं। "कोरोना" से पहाड लौटे युवाओं की उन्होंनें  खोजबीन शुरू कर दी है, पंचायतों के माध्यम से उनसे सम्पर्क कर उनकी शैक्षिक योग्यता, रूची और अनुभवों को एकत्र किया जा रहा है, ताकि उसका उपयोग किया जा सके व उन्हें नौकरी देंनें मदद की जा सके, पौडी जिले में अनुमानतः 12,000 लोग बाहर से आये हैं, जिसमे 62 लोग विदेशों में कार्यरत थे, जो अधिकतर असंगठित क्षेत्र काम कर रहे थे, अगर उन्हें यही काम दिया जा सके तो राज्य को इसका दोहरा लाभ मिलेगा। गढवाल मंडल की कुल 3661813 हेक्टेयर जमीन में से 142554 हेक्टे. कृषि खेती लायक है, जिसमें खेती, बागवानी के सुविधा मिले तो खेती का काम आसानीं से हो सकता है। अपर निदेशक परम राम बताते हैं, की 381 न्याय पंचायतों में ’कृषि निवेश केंद्र’ स्थापित किये गये हैं, जिनमें किसानों को दवा, बीज, उपकरण मुहैय्या कराये जाते हैं। लेकिन अच्छा होता इनकी तादात बढाई जाती तथा ये केद्र महज बीज,उपकरण तक सीमित न होकर कृषि-बागवानी के "नॉलेज सेंटर" के रूप में विकसित किये जाते जहॉ खेती-किसानी की नई-नई तकनीकों की जानकारी दी जाती।  केन्द्र पर हर फसल की तैयारी से पूर्व विशेषज्ञों को आमंत्रित कर किसानों से उनकी समस्याओं से रूबरू होते, अच्छी पैदावार करनें वाले कुशल किसानों को राज्यपाल या सीएम द्वारा सम्मानित किया जाय तो परिणाम गुणात्मक रूप से प्राप्त होंगें।

 

कोरोंना संकट से प्रभावित होंनें वाले देशों में भारत सबसे निचले पायदान पर है, तथापि भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता लव अग्रवाल की मानें तो ये अभी तक 40 फीसदी तक कमीं आ चूकीं है, कोरोना संक्रमित मरीजों में महज 2.0 फीसदी लोंगों को ही ’वेंटिलेटर’ की जरूरत हुई है, बाकि 98 फीसदी लोगों को बिना "वेंटिलेटर" के बिना ठीक हुऐ, जबकी उत्तराखण्ड के पहाडी इलाकों में इसकी इंन्ट्री ही नहीं हुई, अव्वल तो पूरा उत्तराखण्ड व अधिकॉश राज्य भी इसके संक्रमण से अछुते रहते अगर ’जमाती’ मेहरबान न होते ? देश में कोविड-19 की अपेक्षाकृत धीमी गति के पीछे की बडी वजह हमारा पारम्परिक खाना-पान है, जिससे हमारी "इम्युनिटी" अन्य देशों (के लोगों) से बेहतर है। पहाड में पारम्परिक रूप से पैदा किये जानें वाली फसलों के औषधीय गुणों की विशेषताऐं  विदित होंनें के बावजूद भी, लोंगों में इसकी रूची का अभाव साफ झलकता है,  कारण विदेशी व फास्ट फूड, चाइनीज चाऊमीन, पीज्जा खानें की आदी नई पीढी को कोदा, झंगोरा, बाडी और पहाडी क्षेत्रों में उगाई जानें वाली दालो व अन्य फसलों के सेवन से बडी से बडी बीमारी से निजात दिलानें में अहम भूमिका है। पहाडी क्षेत्रों में पायी जानें वाली बद्री नस्ल की गायों के दूध से कैंसर जैसी बीमारी का उपचार होंना संभव है। लेकिन सरकार का ध्यान कभी ऐसे वातावरण पर काम करनें का मन नही बना, जो न केवल रोजगार के अवसर पैदा करते बल्कि अच्छे स्वास्थ्य व डॉक्टरों की दवा खानें से मुक्ति मिलती ।

 

कोरोना वापसी नें घर लोटे लोंगों व सरकार को इन सब की उपयोगिता जाननें-समझानें का मौका दिया है। सरकार केवल उन्हें नैतिक बल प्रदान करे बाकि का काम वे, स्वतः कर लेंगें, "कोरोना वायरस" की सूनें तो उसनें पहाडवासियों को ऐसे ही कुछ संदेश दिया   है।